मंदसौर और नीमच में ही क्यों होती है अफीम की अधिक खेती, मंदसौर के लोग सगाई के समय अफीम का पट्टा क्यों देखते हैं


अफीम और अफीम की खेती से जुड़ी सभी बातें 2021



मंदसौर और नीमच जिले ने अफीम की खेती के लिए पूरे प्रदेश में अपनी अलग पहचान बना रखी है। पूरे प्रदेश में मंदसौर नीमच और रतलाम जिले की काली मिट्टी में सबसे अधिक काले सोने की खेती की जाती है। यहां पर करीब 40000 किसान अफीम की खेती करते हैं। मंदसौर और नीमच से लगे हुए राजस्थानी क्षेत्र में भी कुछ किसान अफीम की खेती करते हैं। यह एक प्रकार का नशीला पदार्थ है, जिस की खेती करने के लिए सरकार से परमिशन लेना जरूरी होती है। अगर कोई बिना सरकार की परमिशन ली है इसकी खेती करता है तो उस पर केस दर्ज हो जाता है।




अफीम को काला सोना क्यों कहते हैं




पूरे देश में अफीम को काले सोने के नाम से भी जाना जाता है। एक समय ऐसा आया था जब 10 ग्राम सोने की कीमत 1 किलो अफीम के बराबर हो गई थी। तब से ही अफीम की तुलना सोने से की जाती है। अफीम की कम पैदावार होने पर किसान अपने कोटे को पूरा करने के लिए ब्लैक मार्केट से अफीम खरीदते हैं। इसका मतलब यह है कि किसान आभूषण बेचकर मजदूरी खरीदता है और इसीलिए अफीम को काला सोना कहा जाता है।




मंदसौर में अफीम का पट्टा देखकर क्यों की जाती है लड़कियों की सगाई





आपको पता ही होगा कि मंदसौर जिले में अगर किसी लड़की की सगाई की जा रही है तो सबसे पहले लड़के वालों से अफीम के पट्टे के बारे में पूछा जाता है। इसका कारण यह है कि लोगों को लगता है कि जिस किसान के पास अफीम का पट्टा है, वह एक संपन्न किसान है। अफीम का पट्टा होने पर किसान को गांव में विशेष दर्जा दिया जाता है। कुछ गांव में अफीम का पट्टा होने पर किसान को पटेल भी कहा जाता है। रिश्ता ढूंढना वाले लोग हमेशा अफीम का पट्टे वाले किसान को ही ढूंढते हैं ताकि मुसीबत में उनको मदद मिल सके।



अफीम की फसल कब और कैसे बोई जाती है




अफीम की फसल बोने के लिए खेत में डोडा दाने डाले जाते हैं। इन्हें पोस्ता दाना या खसखस भी कहते हैं। अफीम की बोनी के लिए अक्टूबर का चौथा सप्ताह और नवंबर का पहला सप्ताह सबसे अच्छा समय होता है। अफीम के लिए शीत ऋतु सबसे अच्छी होती है। बोवनी के बाद 90 दिनों में डोडा परिपक्व हो जाता है और फिर अफीम निकालने के लिए डोडे पर चीरा लगाया जाता है। इस पर चीरा लगाने के लिए एक विशेष प्रकार का चाकू बनाया जाता है। किसान इस चाकू को नक्का कहते हैं। नक्के से किसान डोडे पर चीरा लगा देते हैं और सुबह तक डोडे पर दूध जैसा तरल पदार्थ आ जाता है और इसी को अफीम कहते हैं। किसान इसे किसी भी बर्तन में सहेज लेते हैं।



अफीम इतनी महंगी क्यों है और यह किस काम आती है




डोडे से निकलने वाली अफीम से कोडीन और मार्फिन निकलती है जो दवाइयां बनाने के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है। यूपी में कोडीन और मार्फिन की जांच नीमच और यूपी के गाजियाबाद में एल्कोलाइड फैक्ट्री में किया जाता है। अफीम की जांच करने के बाद ही सरकार उसकी क्वालिटी और दाम तय करती है। अफीम निकालने के बाद भी डोडा नशा करने में काम आता है और इसकी भी प्रदेश में तस्करी की जाती है।



कैसे मिलता है अफीम की खेती करने के लिए लाइसेंस



केंद्र स्तर पर मीटिंग होने के दौरान वित्त मंत्रालय हर वर्ष नई अफीम नीति जारी करता है। हर वर्ष अफीम नीति में पिछले वर्षों की अफीम के मुताबिक पट्टा दिया जाता है जिसमें मार्फिन और अफीम की क्वालिटी देखी जाती है। नारकोटिक्स विभाग अफीम नीति के आधार पर किसानों को पट्टे वितरित करता है। अफीम के किसानों को मार्फिन के आधार पर 6,10 और 12 आरी के पट्टे दिए जाते हैं। किसान को जितना पट्टा मिलता है वह उतने ही फसल बो सकता है।



 पहले अफीम को जंगली पौधा कहा जाता था




आपको भरोसा नहीं होगा लेकिन अफीम पहले जंगली पौधे की गिनती में आता था। अफीम का पौधा पहले जंगली था और मुगलों के राज में इसे नशे के रूप में उपयोग में लाया गया उसके बाद से इसे फसल का दर्जा दे दिया गया। ब्रिटिश काल में अफीम की खेती के लिए लाइसेंस दिए जाने लगे ताकि अवैध रूप से इसकी खेती नहीं हो। उसके बाद सरकार द्वारा वर्ष 1985 में एक्ट बनाकर अफीम की खेती को मादक पदार्थ अधिनियम में रख दिया गया।




मालवा क्षेत्र में ही क्यों होती है अफीम की खेती



देश में सबसे अधिक अफीम की खेती मालवा क्षेत्र में होती है। मंदसौर नीमच और रतलाम जिले में सबसे अधिक अफीम की खेती होती है क्योंकि यहां की मिट्टी काली है और मौसम भी अफीम के लिए अनुकूल रहता है। तीनों जिले में 40,000 से अधिक किसान अफीम की खेती करते हैं। सरकार किसानों से मार्फिन के आधार पर अफीम लेती है और कम अफीम देने पर अगले साल पट्टा काट दिया जाता है।



सरकार आपको अफीम के लिए लाइसेंस कब देती है




वर्ष 1997 तक सरकार सभी किसानों को अफीम की खेती करने के लिए लाइसेंस देती थी लेकिन किसानों द्वारा गलत फायदा उठाने पर अब लाइसेंस देना बंद कर दिए हैं। वर्ष 1985 तक सरकार द्वारा अफीम के पट्टे के लिए 50 आरी का लाइसेंस दिया जाता था लेकिन अब 12 आरी ही दिया जाता है। सरकार अफीम के पट्टे सिर्फ उन किसानों को देती है जिनके पास पहले भी अफीम के पट्टे हो और अफीम की खेती कर चुका हो। सरकार द्वारा किसी भी किसान को नए अफीम के पट्टे जारी नहीं किए जाते हैं।










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