1857 क्रांति मंदसौर की कहानी: मंदसौर में भी हुआ था आजादी के लिए संघर्ष🇮🇳, मंदसौर में भी मनाया गया था आजादी का जश्न, मंदसौर में 63 दीनो तक लहरा रहा था आजादी का परचम🇮🇳

 




देश को स्वतंत्र कराने के लिए कई वीर जवानों और महापुरुषों ने अपने बलिदान दिए। इनमें से कुछ वीर जवानों के नाम अभी देश के लोगों को पता है और कुछ वीर ऐसे भी हैं जिनको इतिहास में नहीं लिखा गया है लेकिन उनका बलिदान भी देश को स्वतंत्र कराने में काफी महत्वपूर्ण रहा है। देश के कोने कोने में बड़े-बड़े वीर जवानों ने देश को आजाद कराने के लिए बलिदान दिया है। देश को आजाद कराने के लिए सबसे पहली बड़ी क्रांति 1857 में हुई थी जिसमें मंदसौर का भी बहुत बड़ा बलिदान रहा था। मंदसौर के भी ऐसे कई वीर जवान है जिन्होंने देश को आजाद कराने में अपना बलिदान दे दिया था। सन् 1857 में राजा शाहजाद फिरोज ने देश को आजाद कराने के लिए लड़ाई छेड़ दी थी। उसके बाद यह क्रांति पूरे देश में फैल गई और सालो तक देश को आजाद कराने के लिए लड़ाई चलती रही। अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में देश के सबसे ज्यादा वीर जवानों और लोगों ने बलिदान दिया था।



क्या थी सन् 1857 में मंदसौर की कहानी



जब सन 1857 की क्रांति के बारे में इतिहासकार कैलाश पांडे से पूछा गया तो उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि उस समय राजा शाहजहां फिरोज ने मंदसौर के किले पर कब्जा कर लिया था। किले पर कब्जा करने के तुरंत बाद राजा फिरोज ने नीमच जिले के जीरन में अंग्रेजो के खिलाफ सबसे पहले लड़ाई छेड़ दी थी जिसमें शाहजाद फिरोज की जीत हुई थी और उसने अंग्रेजों के कैप्टन रीड और टक्कर की गर्दन काट कर उनकी मुंडी को मंदसौर की लेकर पश्चिमी दरवाजे पर लटका दिया था। उसके बाद इस दरवाजे को मुंडी गेट के नाम से जाना जाता है और वर्तमान में इसका नाम मंडी गेट रख दिया गया है। उसके बाद जब अंग्रेजों को खबर लगी तो राजा फिरोज को मारने के लिए अंग्रेज अधिकारी डयूरेंट ने 7 सेनापति वाली सेना को mandsaur भेजा और राजा फिरोज को हराने के लिए कहा। सेनापति अपनी सेना के साथ mandsaur पहुंचे और लड़ाई शुरु कर दी।



4 दिनों तक चला यह युद्ध



22 नवंबर को मंदसौर के राजा फिरोज की सेना भी युद्ध के लिए नीमच की ओर चल पड़ी। उसके बाद युद्ध हुआ और 4 दिनों तक युद्ध चला। इस युद्ध में लेफ्टिनेंट रेड में मारा गया लेकिन आखिर में आकर जीत अंग्रेजों ने हासिल कर ही ली। सन् 1857 में राजा फिरोज के रहने तक 68 दिनों तक मंदसौर के किले पर देश के आजादी का परचम लहराया लेकिन उसके बाद शासन अंग्रेजों के हाथ में चला गया था। इस लड़ाई में मंदसौर के भी कई वीर बलिदान हुए जिनके बारे में इतिहास में इतना नहीं लिखा गया है। आज हम आपको उन वीर बलिदानों के बारे में बताएंगे जिन्होंने देश को आजाद कराने में अपना बलिदान दिया और मंदसौर को भी आजाद कराने के लिए संघर्ष किया।



मंदसौर के वीर केशव प्रकाश बचपन से ही सेनानी बन गए



देश को आजाद कराने में मंदसौर के वीर केशव प्रकाश का जन्म 15 अगस्त 1920 को हुआ था। यह बचपन से ही देश को आजाद कराने में अपना योगदान देने लगे। विद्यार्थी होने के बावजूद भी इन्होंने देश को आजाद कराने वाली गतिविधियों में हिस्सा लिया। यह जब विद्यार्थी थे तभी लोगों को जागरूक करने लग गए थे और गली मोहल्लों में नारे लिखना शुरू हो गए थे। विद्यार्थी होने के बाद भी इन्होंने लोगों के साथ बैठक लेना शुरू कर दिया था। इन्होंने नारायणगढ़ में पजामंडल की स्थापना की जहां पर आजादी की नींव रखी गई। उसके बाद इन पर गिरफ्तारी का वारंट लग गया था लेकिन फिर भी घर से दूर रहकर आज़ादी की लड़ाई लड़ी। इन्होंने खरगोन, राजस्थान के अजमेर तक आजादी की लड़ाई लड़ी। आखिरकार देश आजाद हो गया और प्रदेश सरकार ने इनको पेंशन देने की बात कही। जब इनके घर टेंशन लेकर पहुंचा गया तो इन्होंने पेंशन लेने से मना कर दिया और कहा कि देश को आजाद कराना हर व्यक्ति का कर्तव्य है।



जब तक सांसे चली देश के लिए ही चली, मरने के बाद शरीर देश के नाम कर दिया



पोरवाल समाज के वीर गुलाबचंद भी युवा अवस्था में ही आजादी की गतिविधियों में जुड़ गए थे। सिर्फ 28 साल की उम्र में ही उन्होंने देश को आजाद कराने की ठान ली थी। सिर्फ एक साल में ही इन्होंने अपना नाम इतना कमा लिया था कि होलकर क्षेत्र से निकलने वाली प्रजामंडल पत्रिका में यह सदस्य बन गए थे। अंग्रेजों को खबर मिलने के बाद इन्होंने पत्रिका को असंवैधानिक घोषित कर दिया। लेकिन फिर भी इन्होंने लड़ाई लड़ना नहीं छोड़ी। सभी आंदोलनों में सबसे आगे रहने और प्रजातंत्र द्वारा जिले का मंत्री बनाने के बाद अंग्रेजों की नजर गुलाबचंद पर पड़ गई। उसके बाद अंग्रेजों द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन ठोस सबूत नहीं होने पर उनको दोबारा छोड़ना पड़ा। जेल से आने के बाद भी उन्होंने देश प्रेम को नहीं छोड़ा और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग ले लिया उसके बाद इन्होंने गरम दल मैं भी स्वयं को साबित कर दिया। इनकी मृत्यु सन 2018 में हुई और उसके बाद इनके शरीर को झालावाड़ अस्पताल में दान कर दिया गया। उनके पोते ने बताया कि वह कहानियां सुनाते रहते थे और कहते थे कि हमारे घर की स्थिति ठीक नहीं थी और आजादी की लड़ाई लड़ने के कारण उन्हें घर से बाहर निकाल दिया गया था लेकिन फिर भी उन्होंने लड़ाई लड़ना नहीं छोड़ी।



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