आखिर कैसे हुआ हिंदू नववर्ष का आरंभ, आज के दिन क्यों मनाया जाता है हिंदुओं का नववर्ष

 




विक्रम संवत जब प्रारंभ नहीं हुआ था तब युधिष्ठिर संवत, कलियुग संवत और सप्तर्षि संवत का प्रचलित थे। इसकि सप्तर्षि संवत की शुरुआत 3076 ईसवी पूर्व हुई थी जबकि कलियुग संवत का आरंभ 3102 ईसवी पूर्व हुई थी। इसी दौरान युधिष्ठिर संवत  का भी प्रारंभ हुआ था। सभी के संवत की शुरुआत चैत्र प्रतिप‍दा से ही होती थी, परंतु अन्य बातें स्पष्ट नहीं थी। विक्रम संवत में वार, नक्षत्र और तिथियों का स्पष्‍टिकरण किया गया था। इसमें पंचांग की बातों के साथ ही बृहस्पति वर्ष की गणना को भी शामिल किया गया। आओ जानते हैं कि विक्रम संवत कैसे प्रारंभ हुआ था।

1. राजा विक्रमादित्य को न्यायप्रिय और अपनी प्रजा के हित को ध्यान में रखने वाले शासक के रूप में जाना जाता था। विक्रमादित्य के काल में उज्जैन सहित भारत के एक बड़े भू-भाग पर विदेशी शासक शासन करते थे। ये लोग अत्यंत क्रूर प्रवृत्ति के होते थे। ये अपनी प्रजा को सदैव कष्ट दिया करते थे। राजा विक्रमादित्य ने संपूर्ण भारत को शकों के अत्याचारों वाले शासन से मुक्त करके अपना शासन स्थापित किया और जनता को भय मुक्त जीवन कर दिया। इसी विजय की स्मृति के रूप में राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत पंचांग का निर्माण करवाया था।...इसके बाद 78 ईसवी में शक संवत का आरम्भ हुआ, जिसे दुर्भाग्यवश आज भारत का राष्ट्रीय संवत माना जाता है।


2.  विक्रम संवत् का आरंभ 57 ईस्वी पूर्व में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के नाम पर हुआ था। वैसे तो फाल्गुन माह के समाप्त होते ही नववर्ष प्रारंभ हो जाता है परंतु कृष्ण पक्ष बितने के बाद चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में जिस दिन सूर्योदय के समय प्रतिपदा होती है उसी दिन से नवसंवत्सर प्रारंभ होना माना जाता है। इसी दिन को भारत के अन्य हिस्सा में गुड़ी पड़वा सहित अन्य कई नामों से जाना जाता है। देश में अनेक विद्वान ऐसे हुए हैं, जो विक्रम संवत को उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा ही प्रवर्तित मानते हैं। इस संवत के प्रवर्तन की पुष्टि ज्योतिर्विदाभरण ग्रंथ से होती है, जो कि 3068 कलि अर्थात 34 ईसा पूर्व में लिखा गया था। इसके अनुसार विक्रमादित्य ने 3044 कलि अर्थात 57 ईसा पूर्व विक्रम संवत चलाया। इसके अलावा 3री सदी के बरनाला के स्तम्भ जिस पर अंकित लेख से भी यह स्पष्ट होता है कि विक्रम संवत कब से प्रचलित है।


  


3. विक्रम संवत अनुसार विक्रमादित्य आज से 2293 वर्ष पूर्व हुए थे। ज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य भी चक्रवर्ती सम्राट थे। विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था। विक्रम वेताल और सिंहासन बत्तीसी की कहानियां महान सम्राट विक्रमादित्य से ही जुड़ी हुई है। कलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ। उन्होंने 100 वर्ष तक राज किया। -(गीता प्रेस, गोरखपुर भविष्यपुराण, पृष्ठ 245)।

  

4. विक्रमादित्य अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे जिनके दरबार में नवरत्न रहते थे। कहा जाता है कि विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था।

  

 5. कहा जाता है कि मालवा में विक्रमादित्य के भाई भर्तृहरि का शासन था। भर्तृहरित के शासन काल में शको का आक्रमण बढ़ गया था। भर्तृहरि ने वैराग्य धारण कर जब राज्य त्याग दिया तो विक्रमसेन ने शासन संभाला और उन्होंने ईसा पूर्व 57-58 में सबसे पहले शको को अपने शासन क्षेत्र से बहार खदेड़ दिया। इसी की याद में उन्होंने विक्रम संवत की शुरुआत कर अपने राज्य के विस्तार का आरंभ किया। विक्रमादित्य ने भारत की भूमि को विदेशी शासकों से मुक्ति कराने के लिए एक वृहत्तर अभियान चलाया और संपूर्ण भारतवर्ष पर अपने राज्य का परचम लहरा दिया था। कहते हैं कि उन्होंने अपनी सेना का फिर से गठन किया था। उनकी सेना विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बई गई थी, जिसने भारत की सभी दिशाओं में एक अभियान चलाकर भारत को विदेशियों और अत्याचारी राजाओं से मुक्ति कर एक छत्र शासन को कायम किया था।


6. कल्हण की 'राजतरंगिणी' के अनुसार 14 ई. के आसपास कश्मीर में अंध्र युधिष्ठिर वंश के राजा हिरण्य के नि:संतान मर जाने पर अराजकता फैल गई थी। जिसको देखकर वहां के मंत्रियों की सलाह से उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने मातृगुप्त को कश्मीर का राज्य संभालने के लिए भेजा था। नेपाली राजवंशावली अनुसार नेपाल के राजा अंशुवर्मन के समय (ईसापूर्व पहली शताब्दी) में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के नेपाल आने का उल्लेख मिलता है। राजा विक्रम का भारत की संस्कृत, प्राकृत, अर्द्धमागधी, हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला आदि भाषाओं के ग्रंथों में विवरण मिलता है। उनकी वीरता, उदारता, दया, क्षमा आदि गुणों की अनेक गाथाएं भारतीय साहित्य में भरी पड़ी हैं। परंतु एक षड़यंत्र के तहत उनके इतिहास को दबाने का प्रयास किया जाता रहा है।





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